इन दो हिन्दू – मुस्लिम संतों की याद में होता है भव्य मेले का आयोजन

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औरैया– ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,हम बुलबुले है इसकी ये गुलसितां हमारा।’ यह कविता आज भी भारत में सभी धर्मों के लोगों के भाईचारे की तस्वीर को प्रस्तुत करती है।इसीलिए भारत को राम रहीम का देश कहा जाता है ..

ऐसी ही दो धर्मो की प्रगाढ़ मित्रता की एक तस्वीर आपको औरैया के फफूंद कस्बे में देखने को मिलेगी। औरैया के फफूंद कस्बे में कई पीढ़ियों से हिन्दू – मुस्लिम मिलकर एक मेले का आयोजन करते है, जिसकी शुरूआत मजार पर चादर और मंदिर में फूल माला चढ़ाकर की जाती है। बात लगभग 400 साल पुरानी है अफगानिस्तान के बुखारा शहर से पीर बुखारी साहब फफूंद आये थे और यहाँ पर उनकी मुलाकात सन्त श्री शहजानंद से हुई और उन दोनों में मित्रता हो गयी। समय के साथ साथ दोनों की मित्रता और भी गहरी होती गयी।बताया जाता है कि इनकी मित्रता की चर्चा आस पास के देशों में भी फैल गयी।

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ये दोनों मित्र मिलकर लोगों की परेशानियां दूर किया करते थे।कहा जाता है कि दोनों के पास अपनी अपनी चमत्कारिक शक्तियां थी ,जिनका प्रयोग वे लोगों की भलाई के लिए किया करते थे।लोगो का कहना है कि पीर साहब दीवार पर बैठकर कही भी जा आ सकते थे और संत साहब के पास अपना दिव्य हाथी था।पीर साहब की दीवार आज भी उनकी मजार के पास मौजूद है।ऐसी मान्यता है कि बिना दोनों की पूजा किये किसी भी मनोकामना पूरी नही होगी।

मेले में जाने वाले लोग अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए पहले जाकर मजार पर चादर चढ़ाते है फिर मंदिर में पूजा अर्चना करते है और दोनों मित्रों से अपनी मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करते है।आज भी लोग यहाँ पर अलग अलग राज्यों व जनपदों से मन्नत मांगने आते है।आज भी यह कस्बा हिन्दू मुस्लिम भाईचारे एवं सौहार्द के लिए जाना जाता है। 

( रिपोर्ट-वरुण गुप्ता, औरैया)

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