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वीर योद्धा आल्हा के आवाहन पर मां सिलहट देवी हुई थीं प्रकट,रहस्यमयी शक्तियां करती है पूजा

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सीतापुर -- महोली ,तहसील मुख्यालय से करीब दस किलोमीटर उत्तर-पश्चिम की ओर बसे सील्हापुर गांव में मां सिलहट देवी का मंदिर है । आसपास और दूर दराज तक इस मंदिर की बड़ी मान्यता है।

सीतापुर -- महोली ,तहसील मुख्यालय से करीब दस किलोमीटर उत्तर-पश्चिम की ओर बसे सील्हापुर गांव में मां सिलहट देवी का मंदिर है । आसपास और दूर दराज तक इस मंदिर की बड़ी मान्यता है।

जनश्रुतियों के मुताबिक वीर योद्धा आल्हा के आवाहन पर मां सिलहट देवी प्रकट हुई थीं। सिलहट देवी मैहर वाली शारदा माई का ही दूसरा रूप हैं। शारदा माई का मुख्य मंदिर मैहर तहसील इलाके में मिर्जापुर गांव में त्रिकूट पहाड़ी पर बना हुआ है। बात गांजर की लड़ाई के समय की है. आल्हा माड़ौगढ़ के राजा देशराज के पुत्र थे. इनकी माता का नाम देवल और भाई का नाम उदल था. दोनों भाइयों की वीरता का कोई सानी न था. स्वाभिमान के चलते जब आल्हा-ऊदल ने महोबा छोड़ा तो कन्नौज के राजा जयचंद्र ने उन्हें अपना सेनापति बनाया.

उस वक्त कन्नौज की रियासत नेपाल की सीमा तक फैली थी. यह इलाका गांजर कहलाता था. इस इलाके में करीब नब्बे गढ़ आते थे. पिसावां थाना क्षेत्र का रेतुहागढ़ वर्तमान में सेरवाडीह के नाम से प्रसिद्ध है, जबकि बेरिहागढ़ वर्तमान में महोली के बेरिहा और मितौली के हिन्दूनगर व सहिबानगर के नाम से जाने जाते हैं. ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख करते हुए बुद्धिजीवी बताते हैं कि रेतुहागढ़ के राजा अरविंदसेन और बेरिहागढ़ के राजा हीर सिंह और बीर सिंह थे. इन गढ़ के राजाओं ने करीब बारह वर्ष से लगान नहीं दिया था. जयचन्द्र ने अपने गोद लिए बेटे लाखन के साथ आल्हा-ऊदल को लगान वसूलने के लिए भेजा था. रेतुहागढ़ फतह करने के बाद आल्हा की सेना ने कठिना नदी के किनारे डेरा डाल दिया.

हीर सिंह और बीर सिंह ने लगान न देकर युद्ध का ऐलान किया. बेरिहागढ़ जीतने के लिए आल्हा की सेना ने हीर सिंह से भयानक युद्ध किया. यह गिरधरपुर और जमुनिया गांव के बीच हुआ था. युद्ध तीन माह तेरह दिन चला, जिसमें आल्हा की सेना की भारी क्षति हुई. आल्हा ने अल्हना से पांच किलोमीटर पूरब एक जंगल में आकर पुत्रजयी के वृक्ष के नीचे अपनी आराध्य देवी शारदा माई का आह्‌वान किया. आल्हा की पूजा पर शारदा देवी जीवधारी शिला के रूप में प्रकट हुईं और आल्हा को जीत का वरदान दिया. वे वहीं विराजमान हो गईं. आल्हा ने उन्हें सिलहट देवी का नाम दिया था.

किंवदंती है कि इसी शिला में नीचे पांच मन वजन सोने की जंजीर भी बंधी हुई है. स्थानीय लोग बताते हैं कि सिलहट देवी के मंदिर में आज भी चमत्कार हुआ करते हैं. यहां प्रतिदिन पहली पूजा कोई रहस्यमयी अदृश्य शक्ति करती है. सिलहट देवी के नाम पर ही सील्हापुर गांव बसा हुआ है. इसी जगह पर एक बड़ा ग्रामीण मेला लगता है , जिसमे दूरदराज के लोग बड़ी संख्या में आते रहते हैं। फिलवक्त ये पौराणिक मन्दिर जहां अपने आप मे इतिहास समेटे है, वहीं रखरखाव और मैनेजमेंट के अभाव में इतिहास बनने की कगार पर खड़ा हुआ है। 

(रिपोर्ट- सुमित बाजपेयी,सीतापुर)

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