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जानें, आखिर क्यों मनाया जाता है 'मुहर्रम' के दिन मातम...

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न्यूज डेस्क-- मुहर्रम इस्लामी वर्ष यानी हिजरी सन्‌ का पहला महीना है। हिजरी सन्‌ का आगाज इसी महीने से होता है। इस माह को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है।

न्यूज डेस्क-- मुहर्रम इस्लामी वर्ष यानी हिजरी सन्‌ का पहला महीना है। हिजरी सन्‌ का आगाज इसी महीने से होता है। इस माह को इस्लाम के चार पवित्र महीनों में शुमार किया जाता है।

मुहर्रम की दसवीं तारीख को इस्लामी कैलेंडर के हिसाब से साल का पहला महीना माना जाता है। इस दिन शहर से लेकर गांवों तक जुलूस और मजसिल निकाले जाते हैं। आज के दिन शिया मुसलमान मजलिस के बाद खुद को यातना देकर मातम मनाते हैं। इस दिन शिया समुदाय के लोग ज़ंजीरों और छुरियों से खुद को घायल करके भी मातम मनाते हैं।

विश्व भर के मुसलमान आज के दिन रोजा रखते हैं और आग का मातम करते हैं। मान्यता है कि पैगंबर मोहम्मद ने भी कर्बला की घटना से पहले इसी दिन रोजा रखा था। यौमे आशुरा के दिन सभी मस्जिदों में इमाम हुसैन की शहादत पर विशेष तकरीरें होती हैं। शिया पुरुष काले कपड़े पहन कर और महिलाएं अपनी चूड़ियां तोड़कर मातम मनाती हैं।

इस्‍लामी मान्‍यताओं के अनुसार इराक में यजीद नाम का जालिम बादशाह इंसानियत का दुश्मन था। यजीद खुद को खलीफा मानता था, लेकिन अल्‍लाह पर उसका कोई विश्‍वास नहीं था। वह चाहता था कि हजरत इमाम हुसैन उसके खेमे में शामिल हो जाएं, लेकिन हुसैन को यह मंजूर नहीं था और उन्‍होंने यजीद के विरुद्ध जंग का ऐलान कर दिया था। पैगंबर-ए इस्‍लाम हजरत मोहम्‍मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन को कर्बला में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था। जिस महीने हुसैन और उनके परिवार को शहीद किया गया था वह मुहर्रम का ही महीना था।

मान्‍यताओं के अनुसार बादशाह यजीद ने अपनी सत्ता कायम करने के लिए हुसैन और उनके परिवार वालों पर जुल्‍म किया और 10 मुहर्रम को उन्‍हें बेदर्दी से मौत के घाट उतार दिया। हुसैन का मकसद खुद को मिटाकर भी इस्‍लाम और इंसानियत को जिंदा रखना था। यह धर्म युद्ध इतिहास के पन्‍नों पर हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो गया। मुहर्रम कोई त्‍योहार नहीं बल्‍कि यह वह दिन है जो अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है।

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