कोरोना महासंकट: विश्व स्वास्थ्य संगठन यानि WHO बना खलनायक !

ज्ञानेन्द्र शुक्ला…

जिस वक्त सारी दुनिया कोरोना महामारी से निजात पाने के लिए छटपटा रही है, संघर्ष कर रही है उस नाजुक दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन और डब्लूएचओ (WHO) को लेकर बेहद आक्रामक रूख अपना लिया. विश्व स्वास्थ्य संगठन की फंडिग को रोकने के साथ ही अमेरिका इससे पूरी तरह नाता तोड़ने की राह पर है.

दरअसल, वुहान से उपजे खौफनाक वायरस ने दुनिया भर मे कहर ढा रखा है, लाखों मौतें हो चुकी हैं. इस सारे घटनाक्रम ने चीन को लेकर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए. इसी बीच तमाम देशों का ध्यान डब्लूएचओ की कार्यशाली पर गया. क्योंकि इसी संगठन पर बीमारी के खतरे को भांपने और आगाह करने की जिम्मेदारी थी. पर वक्त रहते डब्लूएचओ उचित कदम नहीं उठा सका और दुनिया एक बड़े खतरे के चंगुल में फंस गयी.

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गंभीर आरोप डब्लूएचओ पर लगाए हैं. उनके मुताबिक चीन से अंदरखाने गठजोड़ के चलते ही इस संगठन ने वुहान वायरस के खतरे को आगाह करने के बजाए इसे छिपाने का काम किया. जिसका खामियाजा दुनिया भर में दस लाख से ज्यादा लोगो को जान देकर चुकानी पड़ी. अभी भी हालात बेकाबू हैं. जर्मनी की न्यूज मैगजीन डेर स्पीगेल ने देश की फेडरल इंटेलिजेंस सर्विस से मिली जानकारी के आधार पर दावा किया कि डब्लूएचओ के मुखिया टेड्रोस एडहैनम गेब्रियेसस से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने निजी तौर पर अनरोध किया था कि कोरोना वायरस के बावत वैश्विक चेतावनी जारी करने में देरी करें.

मैगजीन के इस दावे से अमेरिकी रुख की पुष्टि होती है. हालांकि डब्लूएचओ ने इसे निराधार व असत्य बताया तो चीन ने भी 21 जनवरी को शी जिनपिंग और टेड्रोस के दरमियान किसी टेलीफोनिक बातचीत के आरोप को खारिज किया है. चर्चा आगे बढ़ाते हैं उससे पहले एकबार समझ लेते हैं डब्लूएचओ और इसकी भूमिका के बारे में.

WHO का बैकग्राउंड

संयुक्त राष्ट्र संघ की अनुषांगिक इकाई है विश्व स्वास्थ्य संगठन यानि डब्ल्यूएचओ. इसकी स्थापना 7 अप्रैल 1948 में हुई. उस वक्त इसके संविधान पर 61 देशों ने हस्ताक्षर किए थे, इस समय 194 देश इसके सदस्य हैं. संगठन का मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जिनेवा में है. इस वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसी का मुख्य उद्देश्य है सभी देशों में स्वास्थ्य का स्तर ऊंचा रखना.

इस संगठन ने स्मॉल पॉक्स बीमारी को खत्म करने में महती भूमिका निभाई. एड्स, इबोला और टीबी जैसी बीमारियों पर नकेल कसने के लिए ये संगठन मुहिम छेड़े हुए है.

अभी तक विश्व स्वास्थ्य संगठन को सबसे बड़ा आर्थिक सहयोग अमेरिका देता रहा. इसके फंड में 15फीसदी हिस्सा अमेरिका तो 8 फीसदी ब्रिटेन देता था. बीते साल अमेरिका ने इसे 55.3 करोड़ डॉलर दिए थे. अकेले बिल एंड मेलिंडा गेट्स से इसे 10 फीसदी फंड मिला.

इसके फंड के जरिए दुनिया भर में टीकाकरण अभियान चलाये जाते हैं, स्वास्थ्य इमर्जेंसी और प्राथमिक इलाज मुहैया कराया जाता है. तीसरी दुनिया के गरीब देशों को खासतौर से मदद दी जाती है.

2018-19 में डब्ल्यूएचओ के फंड का 19.36% हिस्सा यानी लगभग 1 बिलियन डॉलर पोलियो उन्मूलन पर खर्च किए गए. अफ्रीकी देशों में चल रहे डब्ल्यूएचओ प्रोजेक्ट्स पर 1.6 बिलियन डॉलर खर्च किए गए.

यूं तो अमेरिका और चीन के दरमियान वैश्विक मंच पर वर्चस्व कायम करने के लिए आरोप प्रत्यारोप के सिलसिले चलते रहते हैं, चीन पर तमाम अमेरिकी आरोपों को इसी सियासत के नजर से देखा जाता रहा है. लेकिन कोरोना संकट के बावत डब्लूएचओ (WHO) पर जो आरोप ट्रम्प सरकार ने लगाए हैं वो इस वैश्विक संगठन की भूमिका को कटघरे में खड़ा कर देता है. परोक्ष तौर अमेरिका चीन को कोरोना विपदा का प्रमुख साजिशकर्ता और डब्ल्यूएचओ को उसमें भागीदार मान चुका है.

WHO पर हैं ये आरोप..

आरोप 1- टेड्रोस एडहैनम गेब्रियेसस ने 1 जुलाई, 2017 को पांच वर्षों के लिए डब्ल्यूएचओ महानिदेशक का पद संभाला. अफ्रीकी मूल के इस पहले महानिदेशक पर चीन की लॉबिंग से पद पर काबिज होने के आरोप लगे हैं. कहा जाता है कि चीन ने टेडरोस के कैंपेन को ना सिर्फ सपोर्ट किया बल्कि कई सहयोगी देशों से वोट भी दिलाए.

आरोप 2- कोरोना वायरस से संबंधित जानकारी 31 दिसंबर को डब्लूएचओ को मिल गयी थी लेकिन चीन की नाराजगी के भय से डब्लूएचओ ने जांच के लिए दल भेजने से परहेज किया. डब्लूएचओ (WHO) और चीन की संयुक्त टीम ने फरवरी में वुहान का दौरा किया. पर उसकी रिपोर्ट में भी भयावह स्तिथि की तस्वीर साफ करने के बजाए चीन की तारीफों के पुल ही बाँधे गए.

आरोप 3- कोविड संक्रमण के शुरुआती मामले दिसंबर में दिखने लगे. लेकिन डब्ल्यूएचओ ने कोई जांच नहीं करवाई. बल्कि 14 जनवरी को इसकी ओर से कहा गया कि इस वायरस का इंसान से इंसान में संक्रमण होने के कोई सबूत नहीं हैं.

आरोप 4- डब्ल्यूएचओ को 23 जनवरी को इमर्जेंसी मीटिंग करनी पड़ी. इसके बावजूद आपात वैश्विक यात्राओँ पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश नहीं की गई. सिर्फ ये कहा गया कि यात्रियों की स्क्रीनिंग ही काफी है. माना जाता है कि अगर उसी वक्त से चीन से जुड़ी फ्लाइट्स बंद कर दी जातीं तो ये दुनिया इस खतरे से बच जाती.

आरोप 5- फिर 27 जनवरी को वायरस दर्जन भर से ज्यादा देशों में पैर पसार चुका था लेकिन डब्ल्यूएचओ का रूख प्रो-चीन बना रहा. इस संकट को महामारी मानने से इंकार करता रहा. जबकि इसी दिन वुहान के मेयर ने बयान दिया था कि कोरोना से जुड़ी जानकारी बताने में देरी नहीं करनी चाहिए.

आरोप 6—डब्लूएचओ के महानिदेशक कोरोना वायरस का जायजा लेने खुद चीन के दौरे पर गए. पर किसी कोताही और चूक पर ज्यादा फोकस करने के बजाए उन्होने इस वायरस से जंग को लेकर चीन के राष्ट्रपति की तारीफों के पुल ही बांधे.

आरोप 7—इस साल 30 जनवरी को कोरोना को पैंडामिक यानि वैश्विक महामारी घोषित करने के बजाय ग्लोबल इमर्जेंसी की घोषणा की गयी, जिससे विश्व समुदाय में कई भ्रम उपजे और समय रहते उचित कदम नहीं उठाए जा सके.

डब्लूएचओ और भारत का रूख

डब्लूएचओ के रूख को लेकर दुनिया के तमाम देशों में तल्खी है. इसकी प्रासंगिकता पर जी-20 की बैठक में पीएम मोदी परोक्ष तौर से सवाल उठा चुके हैं. मोदी विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी संस्थाओ में बड़े बदलाव और सुधार के पक्षधर हैं. भारत ने इस संगठन के सुझावों को दरकिनार करके इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की जानकारियों व सुझावों को तवज्जो दी है.

16 मार्च को डब्ल्यूएचओ की तरफ से बताया गया कि कोरोना से लड़ने का मंत्र टेस्ट, टेस्ट और टेस्ट है. जबकि आईसीएमआर की ओर से स्पष्ट कर दिया गया कि बिना देखे सुने टेस्ट नहीं किए जाएंगे. भारत आइसोलेशन, आइसोशन और आइसोलेशन के मंत्र के सहारे ही आगे बढ़ेगा. डब्लूएचओ ने संक्रमण के लक्षण वालों, स्वास्थ्य कर्मियों के लिए ही मास्क की सिफारिश की थी पर भारत सरकार ने बाहर निकलने वाले हर व्यक्ति के लिए मास्क जरूरी करने की एडवाइजरी जारी कर दी.

गौरतलब है कि वुहान, कोविड, चीन, लैब वायरस, वैश्विक साजिश को लेकर तस्वीरें अभी भी साफ नहीं हैं. पर कोरोना से जुड़ी जानकारियों और फैसलों को लेकर डब्लूएचओ की कार्यशैली संदेह उत्पन्न करने के लिए काफी है. सारी दुनिया में ये संदेश गया कि चीन का डब्लूएचओ पर नियंत्रण हो चुका है. जिसकी वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना के मामले में चीन से आ रहे खतरे की अनदेखी की. चीन से सवाल पूछने के बजाए वुहान संक्रमण को लेकर चीन को क्लीन चिट भी देता रहा.

नतीजतन दुनिया भ्रमित रही, कोविड वायरस के खतरे को वक्त रहते समझा ही नहीं जा सका और देखते देखते कोरोना वैश्विक महामारी बन गया. दुनिया को खतरे में डालने की कीमत पर चीन की तरफदारी ने इस संगठन को संदेह के घेरे में ला दिया है. इसकी साख पर सवालिया निशान लगा दिए हैं. पोस्ट कोरोना दौर में डब्लूएचओ की प्रासंगिकता की मीमांसा होना तय है.

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